मैं भक्तन को दास भगत मेरे मुकुटमणि
गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित श्री रामचरितमानस की यह
अनुपम प्रभु भक्ति प्रदायी चौपाई -
मोरे मन प्रभु अस विश्वासा !
राम ते अधिक राम कर दासा !!
.. प्रभु श्री राम जी से भी श्री राम भक्तों की महिमा अधिक सूचित कर -
सभी आश्रितों -शरणागतों को दासानुदास भक्ति की प्रेरणा दे रही है !
जैसे भैया शत्रुघन जी ने भरत जी का आश्रय लिया !
रिपु सूदन पद कमल नमामि !
सूर सुशील भरत अनुगामी !!
जय भक्ति -भक्त -भगवंत गुरु !!
श्री भगवान भी दुर्वाषा ऋषि को महाराज अम्बरीश प्रसंग पर "अहम् भक्त पराधीनो" कह भक्त शरण जाने
को बोलते हैं
इसी प्रकार श्री रामचरितमानस में लिखा है कि जो प्रभु कभी किसी के द्वारा अपना अपमान-निंदा या
गलती होने पर भी "राखि न प्रभु हिय चुक किये की " के अनुसार क्रोधित नहीं होते वही समदर्शी
भक्त-वत्सल दीनानाथ भक्त के प्रति अपराध किये जाने पर - अत्यंत कुपित हो नष्ट कर देते हैं !
जो अपराध भक्त कर करइ ! राम रोष पावक सो जरइ !!
हमारे ब्रज धाम में प्यारे कृष्ण कन्हैया की वाणी-सन्देश-प्रेम है कि -
"मैं भक्तन को दास भगत मेरे मुकुटमणि "
"भगत जहाँ मेरे पग धरें तहां धरूँ मैं शीश "
आइये प्रेम से प्रेम के प्रेमी भक्तवत्सल भगवान को प्रस्तुत पंक्तियों में याद करें - अनुभव करें कि समदर्शी
होते हुए भी भगवान कैसे भक्तदर्शी हो प्रेम में पक्षपात किया करते हैं !!!
रामहि केवल प्रेम पियारा !!
हरि व्यापक सर्वत्र समाना ! प्रेम तें प्रगट होहिं में जाना !!
सबते ऊँची प्रेम सगाई !
झूंठे फल सबरी के खाए - प्रेम विवस रघुराई !!
सबते ऊँची प्रेम सगाई !!
दुर्योधन कि मेवा त्यागी - पट विदुर घर खायी !!
सबते ऊँची प्रेम सगाई !!
प्रेम विवस अर्जुन रथ हांक्यो - भूल गए ठकुराई !!
सबते ऊँची प्रेम सगाई !!
ऐसी प्रीति बढ़ी वृन्दावन - गोपियाँ नाच नचाई !!
सबते ऊँची प्रेम सगाई !!
सुर कुर कछु लायक नाहीं - कही विधि करत बड़ाई !!
सबते ऊँची प्रेम सगाई !!
*जय श्रीराधे *
